भारतीय संस्कृति में पूजा-पाठ केवल एक परंपरा नहीं बल्कि ईश्वर से जुड़ने का माध्यम माना गया है। जब कोई भक्त परमात्मा की आराधना करता है, तो उसका उद्देश्य केवल आस्था प्रकट करना ही नहीं होता, बल्कि मन, शरीर और वातावरण को पवित्र बनाना भी होता है। इसी क्रम में Shodashopachara Puja Vidhi का विशेष महत्व बताया गया है। यह विधि केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि देवत्व के प्रति समर्पण और सम्मान की पूर्ण अभिव्यक्ति है।
“षोडशोपचार” शब्द का अर्थ है सोलह प्रकार की सेवाएँ या सम्मान। जैसे किसी अतिथि का सत्कार सोलह प्रकार से किया जाता है, उसी प्रकार देवता का भी सत्कार सोलह उपचारों के माध्यम से किया जाता है। यही कारण है कि इसे पूजा की सबसे पूर्ण और शुद्ध विधि माना गया है।
आज के युग में भी जब व्यक्ति मानसिक शांति और आत्मिक बल की तलाश करता है, तब Shodashopachara Puja Vidhi उसे ईश्वर के साथ गहरे स्तर पर जोड़ने में सहायक होती है। यह केवल परंपरा को निभाना नहीं बल्कि जीवन के हर पहलू में सामंजस्य और सकारात्मक ऊर्जा को आमंत्रित करने का एक मार्ग है। तो करते हैं श्री गणेश इस विषय का – नमस्ते! Anything that makes you feel connected to me — hold on to it. मैं Aviral Banshiwal, आपका दिल से स्वागत करता हूँ। 🟢🙏🏻🟢
षोडशोपचार पूजन का अर्थ
षोडशोपचार पूजन का अर्थ समझने के लिए सबसे पहले इसके शब्द-विच्छेद पर ध्यान देना आवश्यक है। “षोडश” का अर्थ होता है सोलह, और “उपचार” का अर्थ है सेवा, सम्मान या सत्कार। इस प्रकार, Shodashopachara Puja Vidhi का आशय है – ईश्वर की सोलह प्रकार की सेवाओं द्वारा की जाने वाली पूजा।
भारतीय संस्कृति में ईश्वर को “अतिथि” माना गया है। जब कोई अतिथि हमारे घर आता है, तो हम उसका आदर सत्कार करते हैं – उसे बैठने के लिए आसन देते हैं, चरण धोते हैं, भोजन कराते हैं और विदाई में सम्मान देते हैं। इसी सिद्धांत पर देवताओं की पूजा भी आधारित है। अंतर केवल इतना है कि यहाँ पूजा का केंद्रबिंदु दैवीय ऊर्जा और आध्यात्मिक भावनाएँ होती हैं।
षोडशोपचार पूजन में प्रत्येक उपचार का अपना महत्व है। जैसे, आसन देना देवता को आमंत्रित करना है, पाद्य अर्पण उनके चरणों का आदर है, गंध और पुष्प सुगंध और सौंदर्य का प्रतीक हैं, तो वहीं दीप और धूप प्रकाश और पवित्रता का प्रतीक माने जाते हैं। इस प्रकार यह विधि केवल बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक प्रक्रिया है जो भक्त और ईश्वर के बीच आत्मीय संबंध स्थापित करती है।
षोडशोपचार पूजन के 16 अंग
षोडशोपचार पूजन का सबसे महत्वपूर्ण भाग इसके सोलह अंग हैं। ये सोलह उपचार केवल प्रतीकात्मक क्रियाएँ नहीं बल्कि भक्त की श्रद्धा और ईश्वर के प्रति सम्मान की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। जिस प्रकार हम अतिथि का सत्कार विभिन्न चरणों में करते हैं, उसी प्रकार देवता को भी इन सोलह विधियों के माध्यम से सम्मानित किया जाता है।
इन अंगों में से प्रत्येक का अपना विशिष्ट महत्व है। उदाहरण के लिए – आह्वान करना देवता को बुलाने की प्रक्रिया है, स्नान कराना शुद्धि और पवित्रता का प्रतीक है, वस्त्र अर्पित करना आदर और स्नेह का प्रतीक है, जबकि दीप जलाना अंधकार को दूर कर ज्ञान और प्रकाश का आवाहन करता है। इस प्रकार Shodashopachara Puja Vidhi का हर चरण भक्त के मन में भक्ति, विनम्रता और आत्मिक संतुलन पैदा करता है। नीचे दी गई सूची और सारणी (टेबल) से प्रत्येक उपचार को विस्तार से समझा जा सकता है।
| क्रमांक | उपचार का नाम | अर्थ / कार्य | महत्व |
|---|---|---|---|
| 1 | आह्वान | देवता का आवाहन करना | पूजा की शुरुआत और देवता को आमंत्रित करना |
| 2 | आसन | बैठने के लिए आसन अर्पित करना | देवता को स्थिरता और सम्मान देना |
| 3 | पाद्य | चरण धोने के लिए जल अर्पित करना | श्रद्धा और शुद्धता का प्रतीक |
| 4 | अर्घ्य | हाथ धोने के लिए जल देना | स्वागत और सम्मान का प्रतीक |
| 5 | आचमन | पीने हेतु जल अर्पित करना | शुद्धि और आतिथ्य का प्रतीक |
| 6 | स्नान | स्नान हेतु जल या गंधोदक अर्पित करना | पवित्रता और शांति का प्रतीक |
| 7 | वस्त्र | वस्त्र अर्पित करना | आदर और स्नेह का प्रतीक |
| 8 | यज्ञोपवीत | जनेऊ अर्पित करना | पवित्रता और धर्म का प्रतीक |
| 9 | गंध | चंदन या गंध लगाना | शांति, शीतलता और श्रद्धा का प्रतीक |
| 10 | पुष्प | फूल अर्पित करना | सौंदर्य, प्रेम और शुद्ध भावना का प्रतीक |
| 11 | धूप | धूप अर्पित करना | वातावरण की पवित्रता और शुभ ऊर्जा |
| 12 | दीप | दीपक जलाना | अज्ञानता दूर कर ज्ञान का प्रकाश |
| 13 | नैवेद्य | भोजन अर्पित करना | कृतज्ञता और समर्पण का भाव |
| 14 | आचमन | पुनः जल अर्पित करना | शुद्धता और पूर्णता का प्रतीक |
| 15 | ताम्बूल | पान/सुपारी अर्पित करना | संतोष और आतिथ्य का भाव |
| 16 | नमस्कार / आरती | प्रार्थना और आरती करना | पूजा का समापन और सम्पूर्ण समर्पण |
पूजा की पूर्व विधि
किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या Shodashopachara Puja Vidhi आरंभ करने से पहले कुछ प्रारम्भिक क्रियाएँ की जाती हैं, जिन्हें पूजा की पूर्व विधि कहा जाता है। इसमें सर्वप्रथम पूजा स्थल की शुद्धि कर चौकी की स्थापना की जाती है। तत्पश्चात गंगाजल का छिड़काव कर वातावरण तथा स्वयं को पवित्र किया जाता है। आचमन मंत्र के द्वारा शरीर और मन की शुद्धि की जाती है, फिर गुरु को नमन कर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। पृथ्वी नमस्कार मंत्र द्वारा धरती माता का वंदन किया जाता है और पवित्र मंत्रों का उच्चारण कर दिव्यता का आवाहन किया जाता है। जब ये सभी प्रारम्भिक प्रक्रियाएँ पूर्ण हो जाती हैं, तभी मुख्य अनुष्ठान अर्थात् षोडशोपचार पूजन आरंभ किया जाता है।
चौकी स्थापना
- अमुक देव/देवी की पूजा चौकी स्थापना करते समय ध्यान रखना है कि चौकी का मुँह पूर्व दिशा की और हो या फिर आपका मुँह पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
- जो भी सामग्री पूजा से संबंधित हैं वो सभी आपके पास पूजा स्थल में उपस्थित होनी चाहिए।
- एक बार जब आप पूजा स्थल में विराजित होंगे तो पूजा सम्पन्न होने तक पूजा स्थल के आसन पर ही विराजमान रहेंगे।
- बार-बार पूजा स्थल से उठना पूजा में व्यवधान और नकारात्मक ऊर्जा को आवाहन देता है।
- अगर आप विवाहित हैं तो जोड़े के साथ पूजा करना विशेष फलदायी होता है।
- चौकी की पूर्ण सज्जा अपने मनोनुसार और सामर्थानुसार करनी चाहिए।
- जिस भी भगवान की आपको पूजा करनी है उनकी प्रतिमा पत्थर या पीतल की हो तो सर्वोपरि है नहीं तो जो हो आपके पास वही उचित है।
गंगाजल नमन
अगर आपके पास गंगाजल हो तो सबसे अच्छा नहीं तो शुद्ध जल को भाव से गंगाजल का स्वरूप मानकर नीचे दिए गये मंत्र से उनको सम्मान देना है।
ओउम् पंचनद्यः सरस्वतीमपि यान्ति सस्त्रोतसः। सरस्वती तु पंचधा सो देशऽभवत्सरित।।
ओउम् गंगायै नमः। गंगामावाहयामि स्थापयामि पूजयामि ध्यायामि।।
पवित्र मंत्र
अपने पूजा स्थल पर पूजा विधान आरम्भ करने से पहले आपको शुद्ध होना है।
ओउम् अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
ओउम् पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु ।।
अर्थात् आप शुद्ध हो या अशुद्ध चाहें किसी भी प्रकार की स्थिति में क्यों न हो भगवान पुण्डरीकाक्ष को याद करने के पश्चात् भगवान पुण्डरीकाक्ष आपको शुद्ध करेंगे। गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु को ही पुण्डरीकाक्ष की संज्ञा दी गई है।
आचमन मंत्र
- ओउम् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा।
- ओउम् अमृतापिधानमसि स्वाहा।
- ओउम् सत्यं यशः श्रीर्मयिः श्रीः श्रयतां स्वाहा।।
पहला मंत्र बोलते समय जल से हाथ धोना है, फिर जल को पीना है तथा पुनः हाथ धोना है।
शिखाबन्धनं
अपना सीधा हाथ चोटी पर रखना है अगर चोटी है तो न होने पर चोटी वाली जगह हाथ रखना है और निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करना है।
ओउम् चिद्रूपिणि महामाये दिव्य तेजः समन्विते।
तिष्ठ देवि शिखा मध्ये तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे।।
प्राणायामः
ओउम् आपो ज्योतीरसोऽमृतम् ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्।।
उपर्युक्त मंत्र का उच्चारण करते हुए ऐसा ध्यान करना है कि हमारे सातों चक्र मूलाधार चक्र से लेकर सहस्त्रार चक्र जागृत हो चुके हैं।
अंगन्यास
जिस मंत्र के आगे कोष्ठक में जो शरीर का अंग लिखा है वहां अपना सीधा हाथ रख कर यह श्लोक बोलना है।
- ओउम् वाङमेआस्येऽस्तु। (मुख)
- ओउम् नसोर्मे प्राणोऽस्तु। (नासिका)
- ओउम् अक्ष्णोर्मे चक्षरस्तु। (नेत्र)
- ओउम् कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु। (कान)
- ओउम् बाह्रोर्मे बलमस्तु। (भुजा)
- ओउम् ऊर्वोर्मे ओजोऽस्तु। (जंघा)
- ओउम् अरिष्टानि मेऽगानि तनूस्त न्वा में सह सन्तु। (सम्पूर्ण शरीर)
गुरु को नमन
अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम तत पदम् दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः
अर्थात:- जो कण-कण में व्याप्त है, सकल ब्रह्मांड में समाया है, चर-अचर में उपस्थित है, उस प्रभु के तत्व रूप को, जो मेरे भीतर प्रकट कर, मुझे साक्षात दर्शन करा दे उन गुरु को मेरा शत-शत नमन है। वही पूर्ण गुरु है जो परम सत्ता के बारे में बतलाता है, परम सत्ता जो निर्जीव और सजीवों को विश्व में व्यवस्थित करता है; मैं ऐसे गुरु को प्रणाम करता हूँ।
पृथ्वी नमस्कार मंत्र
ओउम् महीघौः पृथ्विं च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम्। पिप्रतान्नो भरीमभिः।।
अगर आप मंत्र ना बोल पाएं तो आप अपने शब्दों में धरती माता को नमस्ते बोलें।
धरती माँ से क्षमा-याचना
समुद्र-वसने देवि, पर्वत-स्तन-मंडिते।
विष्णु-पत्नि नमस्तुभ्यं, पाद-स्पर्शं क्षमस्व मे॥
अर्थात् समुद्र को वस्त्र के स्वरूप में धारण करने वाली पर्वत रूपी स्तनों से मंडित भगवान विष्णु की पत्नी हे माता पृथ्वी! आप मुझे पैर रखने के लिये क्षमा करें; और जैसे आप अपने शब्दों में बोल पाएं वैसे।
पूर्वजों को नमन
ओउम् पितृरेभ्यो नमः।
पितृणामावाहयामि स्थापयामि पूजयामि ध्यायामि।।
अगर उपर्युक्त मंत्र न बोल पाएं तो कहें कि मैं अपने पूर्वजों को आदर-सद्भाव के साथ सत-सत नमन करता हूँ।
क्षेत्रपाल पूजनं
जहां आप रह रहें हैं उस जगह का उत्तरदायित्व वहां के देव का होता है जिनको हम क्षेत्रपाल कहते हैं, जिनको हम नमस्ते नीचे दिए गये मंत्र से कह रहे हैं और अपनी पूजा में उनका आवाहन भी कर रहें हैं तथा साथ-ही-साथ ये भी प्रार्थना कर रहें हैं कि हमारी पूजा में सकारात्मक ऊर्जा का आगमन हो और क्षेत्र में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा का विनाश हो।
ओउम् भ्राजच्चन्द्र जटाधरं त्रिनयनं नीलांजनाद्रि प्रभं दोद्र्दण्डात्त कृपाल मरुण स्रग्गन्ध वस्त्रोऽज्वलम्।।
घण्टा मेखल घर्घर ध्वनि लसज्झंकार भीमं विभं। वन्दे संहति सर्प कुण्डलधरं श्री क्षेत्रपालं सदा।।
दीप प्रज्वलित मंत्र
उपर्युक्त बताया गया सब-कुछ करने के पश्चात् अब आपको दीपक प्रज्वलित करना है फिर हाथ जोड़ कर नीचे दिया हुआ मंत्र बोलना है; अगर आपको मंत्र याद हो जाए तो दीपक प्रज्वलित करते-करते भी बोल सकते हैं।
ॐ भो दीपदेवरूपस्त्वम् कर्मसाक्षी ह्यं विघ्नकृत। यावत कर्म समाप्तिः स्यात् तावत्त्वम् सुस्थिरो भव।।
संकल्प मंत्र
ओउम् विष्णु विष्णु विष्णु अद्य श्री मद् भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीय प्रहराद्र्धे श्री श्वेत वाराह कल्पे सप्तमे वैवश्वत। मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलि प्रथम चरणे जम्बू द्वीपे भरत खण्डे आर्यावर्ता अन्तर्गत ब्रह्म वर्तक देशे परम पुनीते भारत वर्षे अमुक मण्डले आदिवाराह भूतेश्वर क्षेत्रे अमुक ग्रामे अमुक विक्रम सम्वत्सरे अमुक शकाव्दे अमुक आयने अमुक ऋतौ अमुक मासे अमुक पक्षे अमुक तिथौ अमुक वासरे अमुक गोत्रोत्पन्नोऽमुक नामाहम् मम कायिक वाचिक मानसिक ज्ञाताज्ञात दोष परिहरणार्थम् श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थम् श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थम् देव पूजनम् अनुष्ठानम् च करिष्ये।।
सरल हिंदी रूप
“ॐ विष्णु विष्णु विष्णु”
आज के पवित्र समय में, भगवान विष्णु की आज्ञा से, श्वेतवाराह कल्प में, वैवस्वत मन्वंतर में, कलियुग के प्रथम चरण में, भारतवर्ष के पुण्यभूमि में, [आपका ग्राम/नगर नाम] स्थान पर, [आपका गोत्र] गोत्र में उत्पन्न, मैं [अपना नाम बोलें], अपने शरीर, वाणी और मन से हुए ज्ञात-अज्ञात पापों और दोषों की शुद्धि के लिए, शास्त्रों में बताए गए पुण्य फल की प्राप्ति के लिए और भगवान परमेश्वर की प्रसन्नता के लिए,
यह देव-पूजन और अनुष्ठान करने का संकल्प करता हूँ।
कलश पूजनं
ओउम् कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठेरूद्र समाश्रितः।
मूले तस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मात्रगणा स्मृताः।।
स्वस्तिवाचन ओउम् स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्वेवदाः स्वस्ति नस्ताक्ष्र्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो वृहस्पतिर्दधातु।।
पंचदेव पूजन
पंचदेव पूजन में मुख्यतः गणेश जी, गौरी जी, शंकर जी, विष्णु जी, लक्ष्मी जी तथा कहीं-कहीं दुर्गा जी का भी पूजन होता है; दुर्गा माँ या गौरी माँ में से कोई एक माँ मिलाकर पंच देवों का पूजन होता है जोकि इस प्रकार है:—
गणेश पूजन
ओउम् नमो सिद्धि बुद्धि सहिताय श्रीमन् महागणधिपतये नमः।
ओउम् गणनां त्वा गणपति गुगंवा हवामहे प्रियणां त्वा प्रियपति गुगंवा हवामहे निधीनां त्वा निधिपति गुगंवा हवामहे वशोमम्।
आहमजानि गर्भधम त्वमजासि गर्भधम्।।
ओउम् गणपतये नमः गणपतिमावाहयामि, स्थापयामि पूजयामि ध्यायामि।।
गौरी पूजन
ओउम् आयंगौः।
पृश्निरक्रमी दसन् मातरं पुर।
पितरञ्च प्रयन्त्स्व।।
ओउम् गौर्ये नमः गौरीमावाहयामि स्थापयामि पूजयामि ध्यायामि।।
रुद्र पूजन
ओउम् नमस्ते रुद्र मन्यवउतो त इषवे नमः।
बाहुभ्यामुत ते नमः।।
ओउम् रुद्राय नमः रुद्रामावाहयामि स्थापयामि पूजयामि ध्यायामि।।
विष्णु पूजन
ओउम् इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्।
समूढ़मस्य पा गुगंवा सुरे स्वाहा।।
ओउम् विष्णुवे नमः विष्णुमावाहयामि स्थापयामि पूजयामि ध्यायामि।।
लक्ष्मी पूजन
ओउम् श्रीश्चत लक्ष्मीश्च पत्नयावहोरात्रे पाश्र्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम।
इष्णन्निषाणामुं मऽइषाण सर्वलोकं मऽइषाण।।
ओउम् लक्ष्म्यै नमः लक्ष्मीमावाहयामि स्थापयामि पूजयामि ध्यायामि।।
नवग्रह पूजन
सूर्य
ओउम् आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृत मत्र्यश्च हिरण्येन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।।
ओउम् सूर्याय नमः।
सूर्यमावाहयामि स्थापयामि पूजयामि ध्यायामि।।
चन्द्र
ओउम् इमं देवो असपत्न गुगंवा सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्येष्ठयाय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियपय।
इमं मनुष्य पुत्रम्मुष्य पुत्रमस्यै विशऽएव वोऽमी राजा सोमोऽस्मकं ब्राह्मणना गुंगवा राज्ञा।।
ओउम् चन्द्रमसे नमः।
चन्द्रामावाहयामि स्थापयामि पूजयामि ध्यायामि।।
भौम(मंगल)
ओउम् अग्नि मूर्द्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्याऽअयं।
अपा सिरेता गुंगवा सि जिन्वति।।
ओउम् भौमाय नमः।
भौममावाहयामि स्थापयामि पूजयामि ध्यायामि।।
बुध
ओउम् उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते स गुंगवा सृजेथामयं च।
अस्मिन्त्स धस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यजमानश्च सीदत।।
वृहस्पति
ओउम् वृहस्पतेअति यदर्यो अर्हाद् घुमद्विभाति क्रतमज्जनेषु।
यद्दादयच्छवसऋत प्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।
उपयाम गृहीतोऽसि वृहस्पतये त्वैष तेथानि बृहस्पतये त्वा।।
ओउम् बृहस्पतये नमः।
बृहस्पतिमावाहयामि स्थापयामि पूजयामि ध्यायामि।।
शुक्र
ओउम् अन्नात्परिस्त्रुता रसं बृह्मणा व्यपिवत् छत्रं पयः सोमं प्रजापतिः।
ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपान गुंगवा शुक्रमन्धसऽइन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृत मधु।।
ओउम् शुक्राय नमः।
शुक्रमावाहयामि स्थापयामि पूजयामि ध्यायामि।।
शनिश्चर(शनि)
ओउम् शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।
शंयोरभिस्त्रवन्तु नः।।
ओउम् शनिश्चराय नमः।
शनिश्चरामावाहयामि स्थापयामि पूजयामि ध्यायामि।।
राहु
ओउम् कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा।
कया शचिष्ठयावृता।।
ओउम् राहुवे नमः।
राहुमावाहयामि स्थापयामि पूजयामि ध्यायामि।।
केतु
ओउम् केतु कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे।
समुषद्भिर जायथाः।।
ओउम् केतुवे नमः।
केतुमावाहयामि स्थापयामि पूजयामि ध्यायामि।।
निष्कर्ष
भारतीय संस्कृति में पूजा-पद्धति केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन के हर पहलू से जुड़ी एक समग्र साधना है। Shodashopachara Puja Vidhi इसका सर्वोत्तम उदाहरण है, जिसमें देवता का सोलह प्रकार से सत्कार किया जाता है। यह प्रक्रिया न केवल भक्ति का भाव जगाती है, बल्कि मन, वचन और कर्म की शुद्धि का भी माध्यम बनती है।
आज के व्यस्त और तनावपूर्ण जीवन में भी यह विधि उतनी ही प्रासंगिक है जितनी प्राचीन काल में थी। पूजा में प्रयुक्त धूप, दीप, गंध और पुष्प वातावरण को शुद्ध बनाते हैं; वहीं नैवेद्य अर्पण कृतज्ञता और समर्पण की भावना को प्रकट करता है। इस प्रकार Shodashopachara Puja Vidhi व्यक्ति को मानसिक शांति, आध्यात्मिक संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है।
हम कह सकते हैं कि यह विधि केवल देवता की आराधना नहीं, बल्कि स्वयं को शुद्ध करने और अपने जीवन को ईश्वर के प्रकाश से आलोकित करने का एक श्रेष्ठ साधन है। यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से षोडशोपचार पूजन करता है, तो वह न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि मानसिक और दार्शनिक दृष्टि से भी लाभान्वित होता है।
अंतिम संदेश
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